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भविष्य पुराण

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भविष्य पुराण अठारह महापुराणों में से एक प्रमुख पुराण है। इसमें भविष्य में होने वाली घटनाओं, धर्म-नीति, व्रत-उपवास, यज्ञ, तीर्थ और विभिन्न राजवंशों का वर्णन मिलता है। यह पुराण धार्मिक आचरण और समाज के मार्गदर्शन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें सूर्य उपासना, देवी-देवताओं की महिमा और कलियुग के प्रभावों का भी विस्तार से वर्णन है।

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भविष्य पुराण हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में विशेष स्थान रखता है। “भविष्य” शब्द का अर्थ है – आने वाला समय, इसलिए इस पुराण में भविष्य से संबंधित अनेक भविष्यवाणियाँ और घटनाओं का उल्लेख मिलता है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से धर्म, आचार-विचार, व्रत-उपवास, दान, यज्ञ, तीर्थ-महात्म्य और सामाजिक नियमों का विस्तृत वर्णन करता है।

इस पुराण को मुख्यतः चार भागों में विभाजित किया गया है – ब्राह्म पर्व, मध्यम पर्व, प्रतिसर्ग पर्व और उत्तर पर्व

  • ब्राह्म पर्व में सृष्टि की उत्पत्ति, देवताओं की कथाएँ और धार्मिक विधियाँ दी गई हैं।

  • मध्यम पर्व में व्रत, दान और पर्वों का महत्व बताया गया है।

  • प्रतिसर्ग पर्व में विभिन्न राजाओं, वंशों और भविष्य की घटनाओं का वर्णन मिलता है।

  • उत्तर पर्व में धर्म, नीति, और कलियुग के लक्षणों का विस्तार से उल्लेख है।

इस पुराण में सूर्यदेव की उपासना विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी गई है। साथ ही, इसमें समाज को धर्म के मार्ग पर चलने, सदाचार अपनाने और पाप से दूर रहने की प्रेरणा दी गई है।

भविष्य पुराण केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि यह सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह ग्रंथ मनुष्य को सत्कर्म, भक्ति और धर्मपालन का मार्ग दिखाता है तथा भविष्य के प्रति सजग रहने का संदेश देता है।

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