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विष्णु पुराण e-book

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विष्णु पुराण हिन्दू धर्म के 18 महापुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन ग्रंथ है। इसमें भगवान विष्णु की महिमा, सृष्टि की उत्पत्ति, विभिन्न युगों का वर्णन, अवतारों की कथाएँ और धर्म के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ भक्ति, ज्ञान और धर्म के संतुलन का संदेश देता है तथा जीवन को सत्य, कर्तव्य और भगवान के प्रति समर्पण की ओर प्रेरित करता है।

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विष्णु पुराण को वैष्णव परंपरा का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। इसकी रचना महर्षि पराशर द्वारा की गई मानी जाती है। यह पुराण मुख्यतः भगवान विष्णु को परम ब्रह्म के रूप में स्थापित करता है और बताता है कि समस्त सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार उन्हीं के द्वारा होता है।

यह ग्रंथ छह अंशों (भागों) में विभाजित है। इसमें सृष्टि की रचना (सर्ग), प्रलय, मन्वंतर, सूर्य एवं चंद्र वंश की वंशावलियाँ, धर्म के सिद्धांत, भूगोल, खगोल और विभिन्न अवतारों का वर्णन विस्तार से मिलता है। भगवान विष्णु के दशावतार—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—का वर्णन विशेष महत्व रखता है।

विष्णु पुराण केवल धार्मिक कथाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह समाज व्यवस्था, राजधर्म, आश्रम व्यवस्था और नैतिक जीवन के आदर्शों का भी मार्गदर्शन करता है। इसमें बताया गया है कि धर्म, सत्य, करुणा और भक्ति ही जीवन की सच्ची नींव हैं।

कलियुग के लक्षणों और भविष्य के कल्कि अवतार का वर्णन भी इस पुराण में मिलता है, जो अधर्म के नाश और धर्म की पुनः स्थापना का प्रतीक है।

🔸 आध्यात्मिक महत्व:

भगवान विष्णु को परम सत्य के रूप में स्थापित करता है

धर्म और कर्तव्य पालन का मार्ग दिखाता है

दशावतार की विस्तृत व्याख्या

भक्ति और ज्ञान का समन्वय

विष्णु पुराण आज भी वैदिक ज्ञान और भक्ति मार्ग का महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसका पाठ और अध्ययन आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

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